Expense ratio kya hai – जानिए यह आपकी इन्वेस्टमेंट पर कैसे असर डालता है

म्यूच्यूअल फण्ड और इन्वेस्टमेंट जगत को जानने और समझने के लिए बहुत सारी टर्म्स और कांसेप्ट है। इन टर्म्स को समझना हमारे इन्वेस्टमेंट निर्णय को बेहतर बनाने में एक बड़ा भाग अदा करता है। ऐसा ही एक कांसेप्ट है हमारी इन्वेस्टमेंट पर लगने वाले चार्ज या खर्चो का। यह खर्चे आपकी की जाने वाली इन्वेस्टमेंट के घटाए जाते है और उसकी रिटर्न को बहुत हद तक प्रभावित करते है। आज के आर्टिकल में आपको हम म्यूच्यूअल फण्ड पर लगने वाले चार्जेज जिसे की टेक्निकल टर्म में एक्सपेंस रेश्यो के नाम से जाना जाता है के बारे में जानेंगे। अगर आप म्यूच्यूअल फण्ड या इन्वेस्टमेंट जगत में नए है और ऐसे कांसेप्ट को समझना चाहते है तो आप बिलकुल सही जगह पर है। तो चलिए आज समझते है की “Expense ratio kya hai” और हमारी इन्वेस्टमेंट पर क्या असर डाल सकता है।

Expense ratio kya hai

एक्सपेंस रेश्यो क्या है – Expense ratio kya hai

एक्सपेंस रेश्यो उन चार्जेज को कहा जाता है है जो म्यूच्यूअल फण्ड हाउस द्वारा म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम को मैनेज और ऑपरेट करने के एवज में लिए जाते है। एक म्यूच्यूअल फण्ड हाउस के अपने बहुत सारे खर्चे होते है जैसे की मैनेजमेंट फीस, स्टाफ की सैलरी, विज्ञापन के खर्चे आदि। इन खर्चो के लिए ही म्यूच्यूअल फण्ड हाउस अपनी हर चल रही स्कीम से एक छोटी परसेंटेज के रूप में एक्सपेंस रेश्यो चार्ज करता है।

मान लीजिये आपने जिस स्कीम में इन्वेस्टमेंट करनी है उसका एक्सपेंस रेश्यो 1% है। अगर आप स्कीम में 1 लाख रूपये इन्वेस्ट कर रहे है तो 1000 रूपये एक्सपेंस रेश्यो के रूप में चार्ज किये जाएंगे। आसान भाषा में कहें तो एक्सपेंस रेश्यो म्यूच्यूअल फण्ड हाउस द्वारा लिया जाने वाला एनुअल मेंटेनन्स चार्ज है।

एक्सपेंस रेश्यो को कैसे कैलकुलेट किया जाता है – Expense ratio ko kaise calculate kiya jaata hai

एक्सपेंस रेश्यो को कैलकुलेट करने के लिए टोटल एक्सपेंस को टोटल एसेट के साथ डिवाइड किया जाता है। जितनी ज्यादा एसेट की वैल्यू होगी उतनी ही कम एक्सपेंस रेश्यो होगी और जितनी कम एसेट वैल्यू होगी उतनी ही ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो। एक्सपेंस रेश्यो का फार्मूला है:

Expense ratio = Total Expense/Total assets

मान लीजिये म्यूच्यूअल फण्ड हाउस द्वारा मैनेज किये जा रहे फण्ड की वैल्यू 100 करोड़ है यानि की उसका AUM (asset under management) 100 करोड़ का है और उसपर होने वाला कुल खर्चा है 2 करोड़। तो इस हिसाब से टोटल एक्सपेंस रेश्यो (TER) हुयी:

Expense ratio = 2/100 = 0.02 or 2%

एक्सपेंस रेश्यो को कैसे चार्ज किया जाता है – Expense ratio ko kase charge kiya jaata hai

अगर आप अपनी म्यूच्यूअल फण्ड इन्वेस्टमेंट को ट्रैक करते होंगे तो आपने यह तो जरूर नोटिस किया होगा की एक्सपेंस रेश्यो के बारे में बात तो कई बार की जाती है लेकिन इन्वेस्ट की जाने वाली रकम से इसे कभी भी डेडक्ट नहीं किया जाता। जैसे की अगर अपने किसी फण्ड में 100,000 इन्वेस्ट किये है तो स्टेटमेंट में वह पुरे 100,000 (अगर आपको 0.5% की डिडक्शन दिखाई देती है तो वह स्टाम्प ड्यूटी है ना की एक्सपेंस रेश्यो। यह टैक्स की एक फॉर्म है सरकार द्वारा वसूला जाता है) ही दिखाई देते है। तो सवाल यह उठता है की आखिर इसे चार्ज किस तरह से किया जाता है?

असल में एक्सपेंस रेश्यो को NAV में एडजस्ट किया जाता है और वह भी साल में एक या दो बार नहीं बल्कि रोज़ाना। हम किसी फण्ड की रोज की जो NAV देखते है उसे एक्सपेंस रेश्यो को घटने के बाद ही रिलीज़ किया जाता है।

ऊपर दिए उदाहरण अनुसार 100 करोड़ AUM पर कुल एक्सपेंस रेश्यो हुयी 2%. इस हिसाब से हमारे द्वारा की जाने वाली 1 लाख की इन्वेस्टमेंट पर साल का कुल एक्सपेंस रेश्यो हुआ 2000 रूपये। इस 200 को एक बार में चार्ज करने की बजाये फण्ड हाउस उसे छोटे भाग में हर दिन आने वाली NAV से डेडक्ट करती है, जैसे की:

2000 = 2000/365 = 5.4

5.4 रूपये हर दिन तब तक आपकी इन्वेस्टमेंट अमाउंट या NAV से डेडक्ट होते रहेंगे जब तक आप उसमे इंवेस्टेड है। अब चूँकि इस 5.4 रूपये को NAV ही से चार्ज किया जाता है इसलिए हमे इस बात का पता नहीं चल पाता की इसे कैसे और कहा काटा गया। NAV पे होने वाली इस डिडक्शन को एक उदाहरण के साथ समझते है।

मान लीजिये आपके इन्वेस्ट किये फण्ड की असल NAV है 50 रूपये तो इस हिसाब से आपको कुल यूनिट आल्लोट होंगे:

100000/50=2000 UNIT

अब क्युकी म्यूच्यूअल फण्ड की NAV पर एक्सपेंस रेश्यो हर दिन चार्ज की जाती है इसलिए हम कुल इन्वेस्टमेंट अमाउंट से 5.4 रूपये घटाएंगे ना की 2000:

100000-5.4=99994.6

अब जो NAV फण्ड हाउस द्वारा डिक्लेअर की जाएगी वह कुछ इस तरह से होगी:

99994.6/2000=49.99

49.99 वह NAV है जिसके आधार पर आपकी उस दिन की इन्वेस्टमेंट की वैल्यू होगी।

एक्सपेंस रेश्यो के भाग – Expense ratio ke bhaag

म्यूच्यूअल फण्ड में चार्ज किये जाना वाला एक्सपेंस रेश्यो सिर्फ एक चार्ज नहीं है बल्कि कई सारे खर्चो का समावेश है। यह खर्चे है:

मैनेजमेंट फीस: यह चार्ज उन लोगो को पेमेंट करने के लिए वसूले जाते है जो म्यूच्यूअल फण्ड को मैनेज करने और उसके ऑपरेशन के लिए जिमेवार होते है। इन लोगो में फंड मैनेजर, मार्किट रीसर्च करने वाले लोग आदि शामिल हो सकते है जिनके स्किल और अनुभव के आधार पर ही एक फण्ड की पर्फोर्मस निर्भर करती है।

मेन्टेन्स एक्सपेंस: किसी म्यूच्यूअल फण्ड के रेगुलर ऑपरेशन में कई सरे लोगो का हाथ होता है। जैसे की ट्रांसफर एजेंट, कस्टमर सर्विस, मार्केटिंग, बिल्डिंग, रेंट, ऑफिस, रजिस्ट्रार एजेंसी आदि है। इन सब का खर्चा और कर्मचारियों को दी जाने वाली सैलरी में एक्सपेंस रेश्यो में से कैलकुलेट की जाती है।

एंट्री लोड: जब कोई नया इन्वेस्टर म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करता है तो उस इन्वेस्टमेंट पर लगने वाले चार्ज को एंट्री लोड कहते है। यह स्कीम और म्यूच्यूअल फण्ड के हिसाब से अलग अलग हो सकता है। लेकिन सेबी की हालहिंकी की गाइडलाइन्स अनुसार म्यूच्यूअल में इन्वेस्ट करने पर कोई भी एंट्री लोड चार्ज नहीं किया जा सकता।

एग्जिट लोड: एंट्री लोड के विपरीत जब कोई इन्वेस्टर म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम से पैसे निकलवाता है तो उस पर लगने वाले चार्ज को एग्जिट लोड कहते है। यह आमतौर पर इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड की टोटल इन्वेस्टमेंट वैल्यू पर एप्लीकेबल होता है। इसकी रेंज 1 से 2% के बीच में हो सकती है और ज्यादातर म्यूच्यूअल फण्ड में 1 साल से पहले पैसे निकलवाने पर एप्लीकेबल होता है।

ब्रोकरेज: म्यूच्यूअल फण्ड प्लान दो तरह के होते है डायरेक्ट और रेगुलर। डायरेक्ट प्लान में किसी भी इन्वेस्टमेंट एडवाइजर का रोल नहीं होता और आप अपनी समझ अनुसार सभी इन्वेस्टमेंट करते है। वहीँ रेगुलर प्लान में आपके साथ एक इन्वेस्टमेंट एडवाइजर जुड़ा होता है जो समय समय पर आपको इन्वेस्टमेंट से जुड़े निर्णय लेने और गाइड करने में मदद करता है। इसके बदले म्यूच्यूअल फण्ड हाउस उसे कुछ कमीशन देते है जो की एक्सपेंस रेश्यो में ही शामिल होता है।

एक्सपेंस रेश्यो इन्वेस्टमेंट रिटर्न पर क्या प्रभाव डालता है – Expense ratio investment return par kya prabhav dalta hai

इसमें कोई दोराये नहीं है की एक्सपेंस रेश्यो आपकी इन्वेस्टमेंट रिटर्न को कुछ हद कम कर देता है। म्यूच्यूअल फण्ड द्वारा अर्जित की गयी किसी भी प्रकार की रिटर्न की एक्सपेंस रेश्यो डेडक्ट करने के बाद ही इन्वेस्टर को पास किया जाता है और ऐसा भी नहीं है एक्सपेंस रेश्यो हमेशा फिक्स ही रहे। इसमें म्यूच्यूअल फण्ड हाउस द्वारा समय समय में बदलाव किये जाते है और यह स्कीम, प्लान, और AUM के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है।

ऐसे में इस बात का निर्णय लेना की कौन की एक्सपेंस रेश्यो इन्वेस्टर के लिए बेहतर रहेगी यह पूरी तरह इन्वेस्टर पर खुद या उसके financial एडवाइजर पर निर्भर करता है। कई बढ़िया फण्ड जो बहुत सालो से अच्छा परफॉर्म कर रहे है उनकी एक्सपेंस रेश्यो नए और कम रिटर्न दे रहे फंड्स के ज्यादा ही होगी। इसलिए यह जरुरी नहीं की अगर किसी फण्ड की एक्सपेंस रेश्यो कम है तो आपको रिटर्न बढ़कर ही मिलेगी। हो सकता है एक ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो वाला फण्ड कम एक्सपेंस रेश्यो वाले फण्ड से कही अच्छा परफॉर्म करे। इसलिए बेहतर यही है की कोई भी इनवेस्टमेंट करने से पहले अच्छी तरह से रिसर्च की जाए या किसी पेशेवर financial एडवाइजर की सलाह से कोई निर्णय लिया जाये।

यह भी जानिए  : Index fund kya hai – कैसे काम करता है और निवेश का तरीका

एक्सपेंस रेश्यो लिमिट – Expense ratio limit

म्यूच्यूअल फण्ड पे चार्ज की जाने वाली एक्सपेंस रेश्यो पर इन्वेस्टर के हित्त को ध्यान में रखते हुए सेबी द्वारा कुछ लिमिट सेट की गयी है गयी है। यह लिमिट आपको निचे दिए गए टेबल से क्लियर हो जाएगी:

Assets Under Management (AUM) Maximum TER (Total Expense ratio) as a percentage of daily net assets
TER for Equity funds TER for Debt funds
On the first Rs. 500 crores 2.25% 2.00%
On the next Rs. 250 crores 2.00% 1.75%
On the next Rs. 1,250 crores 1.75% 1.50%
On the next Rs. 3,000 crores 1.60% 1.35%
On the next Rs. 5,000 crores 1.50% 1.25%
On the next Rs. 40,000 crores Total expense ratio reduction of 0.05%
for every increase of Rs. 5,000 crores of
daily net assets or part thereof.
Total expense ratio reduction of 0.05%
for every increase of Rs. 5,000 crores of
daily net assets or part thereof.
Above Rs. 50,000 crores 1.05% 0.80%

Source: AMFI

जैसा की ऊपर दिए टेबल से क्लियर है जितना कम म्यूच्यूअल फण्ड का AUM होगा उतनी ही ज्यादा उसकी एक्सपेंस रेश्यो होगी। इसी तरह फण्ड का टाइप भी एक्सपेंस रेश्यो पर फर्क डालता है। जैसे की इक्विटी और डेब्ट फण्ड दोनों के लिए रेश्यो अलग है और जैसे जैसे किसी फण्ड का साइज घटता या बढ़ता है यह बदलती भी रहती है।

निष्कर्ष – Conclusion

आम भारतीय इन्वेस्टर्स के लिए इन्वेस्टमेंट डिसिशन लेते समय एक्सपेंस रेश्यो को ध्यान में रखना बहुत जरुरी है। तक यह इस जरुरी financial मेट्रिक है जो हमारी इन्वेस्टमेंट की रिटर्न को काफी हद तक प्रभावित करता है। इसे जानना और समझाना हमारे इन्वेस्टमेंट डिसिशन को बेहतर बनाने में मदद करता है और लॉन्ग टर्म में हमे इसका फायदा ही देखने को मिलेगा। हमेशा इस बात का ध्यान रखे की इन्वेस्टमेंट जगत में एक्सपेंस पे हर बचाया गया हर रुपया रिटर्न को बढ़ाने का ही काम करता है।

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